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रविवार, 3 मई 2015

कोशिश कर, हल निकलेगा

कोशिश कर, हल निकलेगा
आज नही तो, कल निकलेगा।

अर्जुन के तीर सा सध,
मरूस्थल से भी जल निकलेगा।

मेहनत कर, पौधो को पानी दे,
बंजर जमीन से भी फल निकलेगा।

ताकत जुटा, हिम्मत को आग दे,
फौलाद का भी बल निकलेगा।

जिन्दा रख, दिल में उम्मीदों को,
गरल के समन्दर से भी गंगाजल निकलेगा।

कोशिशें जारी रख कुछ कर गुजरने की,
जो है आज थमा थमा सा, चल निकलेगा।.....

जाने क्यू

जाने क्यूं
अब शर्म से,
चेहरे गुलाब नही होते।
जाने क्यूं
अब मस्त मौला मिजाज नही होते।

पहले बता दिया करते थे, दिल की बातें।
जाने क्यूं
अब चेहरे,
खुली किताब नही होते।

सुना है
बिन कहे
दिल की बात
समझ लेते थे।
गले लगते ही
दोस्त हालात
समझ लेते थे।

तब ना फेस बुक
ना स्मार्ट मोबाइल था
ना फेसबुक
ना ट्विटर अकाउंट था
एक चिट्टी से ही
दिलों के जज्बात
समझ लेते थे।

सोचता हूं
हम कहां से कहां आ गये,
प्रेक्टीकली सोचते सोचते
भावनाओं को खा गये।

अब भाई भाई से
समस्या का समाधान
कहां पूछता है
अब बेटा बाप से
उलझनों का निदान
कहां पूछता है
बेटी नही पूछती
मां से गृहस्थी के सलीके
अब कौन गुरु के
चरणों में बैठकर
ज्ञान की परिभाषा सीखे।

परियों की बातें
अब किसे भाती है
अपनो की याद
अब किसे रुलाती है
अब कौन
गरीब को सखा बताता है
अब कहां
कृण्ण सुदामा को गले लगाता है

जिन्दगी मे
हम प्रेक्टिकल हो गये है
मशीन बन गये है सब
इंसान जाने कहां खो गये है!

इंसान जाने कहां खो गये है 
इंसान जाने कहां खो गये है....!!!!

शुक्रवार, 1 मई 2015

कोशिश कर, हल निकलेगा

कोशिश कर, हल निकलेगा।
आज नही तो, कल निकलेगा।
अर्जुन के तीर सा सध,
मरूस्थल से भी जल निकलेगा।।
मेहनत कर, पौधो को पानी दे,
बंजर जमीन से भी फल निकलेगा।
ताकत जुटा, हिम्मत को आग दे,
फौलाद का भी बल निकलेगा।
जिन्दा रख, दिल में उम्मीदों को,
गरल के समन्दर से भी गंगाजल निकलेगा।
कोशिशें जारी रख कुछ कर गुजरने की,
जो है आज थमा थमा सा, चल निकलेगा।।

माना कि तुम लफ़्ज़ों के बादशाह हो

बस एक करवट ज्यादा ले लूं किसी रोज़ सोते
वक़्त,
माँ आज भी आकर पूछ लेती है "बेटा, तबियत
तो ठीक है
_______________

रूठ कर तुम चली गइ हो तो जरा इतना बता दो
ख्वाबों में आने का अधिकार तुम्हे किसने दे दिया है

माना कि तुम लफ़्ज़ों के बादशाह हो,मगर हम भी खामोशियों पर राज़ करते हैं!

तकलीफें तो हज़ारों हैं इस ज़माने में….
बस कोई अपना नज़रअंदाज़ करे तो बर्दाश्त नहीं होता…

इत्र से कपड़ो का महकना बड़ी बात नही
मजा तब है जब खुशबू आपके किरदार से आए

रख लो दिल में सम्भालकर थोङी सी याद मेरी..!
रह जाओ जब तन्हा बहुत काम आएगें हम…!!

मजबूरियॉ ओढ के निकलता हूं घर से आजकल, वरना शौक तो आज भी है बारिशों में भीगनें का

ना शौक दीदार का… ना फिक्र जुदाई
की, बड़े खुश नसीब हैँ वो लोग जो…
मोहब्बत नहीँ करतेँ

फ़र्क़ नहीं पड़ता माला को,
गर कोई मोती टूट जाये।
पर धागे का हाल पूछना ,
सब खाली खाली सा हो जाता है।

रविवार, 26 अप्रैल 2015

सुकून उतना ही देना

          सुकून उतना ही देना
  प्रभु जितने से जिंदगी चल जाए,
     औकात बस इतनी देना कि
        औरों  का भला हो जाए,
    रिश्तो में गहराई इतनी हो कि
          प्यार से निभ जाए,
    आँखों में शर्म इतनी देना कि
       बुजुर्गों का मान रख पायें,
     साँसे पिंजर में इतनी हों कि
        बस नेक काम कर जाएँ,
          बाकी उम्र ले लेना कि
      औरों पर बोझ न बन जाएँ !!

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

Ahista chal zindagi

Ahista chal zindagi, abhi kai karz chukana baaki hai.

Kuch dard mitana baaki hai, kuch farz nibhana baaki hai.

Raftaar mein tere chalne se kuchh rooth gaye, kuch chhut gaye.

Roothon ko manana baaki hai, roton ko hasana baki hai.

Kuch hasraatein abhi adhuri hain, kuch kaam bhi aur zaruri hai.

Khwahishen jo ghut gayi is dil mein, unko dafnana baki hai.

Kuch rishte ban kar toot gaye, kuch judte-judte chhut gaye.

Un tootte-chhutte rishton ke zakhmon ko mitana baki hai.

Tu aage chal main aata hoon, kya chhod tujhe ji paunga?

In saanson par haqq hai jinka, unko samjhaana baaki hai.

Aahista chal zindagi, abhi kai karz chukana baki hai...

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

नज़र रखो

         नज़र रखो अपने 'विचार' पर,
            क्योंकि वे ''शब्द'' बनते हैँ।

            नज़र रखो अपने 'शब्द' पर,
             क्योंकि वे ''कार्य'' बनते हैँ।

             नज़र रखो अपने 'कार्य' पर,
           क्योंकि वे ''स्वभाव'' बनते हैँ।

           नज़र रखो अपने 'स्वभाव' पर,
            क्योंकि वे ''आदत'' बनते हैँ।

           नज़र रखो अपने 'आदत' पर,
            क्योंकि वे ''चरित्र'' बनते हैँ।

          नज़र रखो अपने 'चरित्र' पर,
      क्योंकि उससे ''जीवन आदर्श'' बनते हैँ।

प्रेम पथिक पगुराता चल

प्रेम पथिक पगुराता चल
तरुण तृषा तरसाता चल
प्रेम........................

         लसत लोल लोचन ललित
         सहज सरल संकुचाता चल
         प्रेम................

चपल चारु चंचल चितवन
बाण बंकिम बरसाता चल
प्रेम .......................

       अलस अलक आतुर अधर
        मादक मधु महकाता चल
       प्रेम........................

उर उमंग अतिरेक अनंग
मन मयूर मदमाता चल
प्रेम..........

      .विरह विकल व्याकुल व्यथित
       देह  दाह  दहकाता   चल
       प्रेम...................

प्रेम प्रभू पावन प्रसाद
दिव्य दरस दरसाता चल
प्रेम.....................
( RATAN SINGH CHAMPAWAT )

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

आहिस्ता चल जिंदगी

आहिस्ता  चल  जिंदगी,अभी
कई  कर्ज  चुकाना  बाकी  है
कुछ  दर्द  मिटाना   बाकी  है
कुछ   फर्ज निभाना  बाकी है
   रफ़्तार  में तेरे  चलने से
   कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
   रूठों को मनाना बाकी है
   रोतों को हँसाना बाकी है
कुछ रिश्ते बनकर ,टूट गए
कुछ जुड़ते -जुड़ते छूट गए
उन टूटे -छूटे रिश्तों के
जख्मों को मिटाना बाकी है
    कुछ हसरतें अभी  अधूरी हैं
    कुछ काम भी और जरूरी हैं
    जीवन की उलझ  पहेली को
    पूरा  सुलझाना  बाकी  है
जब साँसों को थम जाना है
फिर क्या खोना ,क्या पाना है
पर मन के जिद्दी बच्चे को
यह   बात   बताना  बाकी  है
     आहिस्ता चल जिंदगी ,अभी
     कई कर्ज चुकाना बाकी    है
     कुछ दर्द मिटाना   बाकी   है  
     कुछ  फर्ज निभाना बाकी है !

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

जब मैं छोटा था

गुलज़ार साहब की कविता :-
जब मैं छोटा था,
शायद दुनिया
बहुत बड़ी हुआ करती थी..
मुझे याद है
मेरे घर से “स्कूल” तक का
वो रास्ता,
क्या क्या
नहीं था वहां,
चाट के ठेले,
जलेबी की दुकान,
बर्फ के गोले
सब कुछ,
अब वहां
“मोबाइल शॉप”,
“विडियो पार्लर” हैं,
फिर भी
सब सूना है..
शायद
अब दुनिया
सिमट रही है…
.
.
.
जब
मैं छोटा था,
शायद
शामें बहुत लम्बी
हुआ करती थीं…
मैं हाथ में
पतंग की डोर पकड़े,
घंटों उड़ा करता था,
वो लम्बी
“साइकिल रेस”,
वो बचपन के खेल,
वो
हर शाम
थक के चूर हो जाना,
अब
शाम नहीं होती,
दिन ढलता है
और
सीधे रात हो जाती है.
शायद
वक्त सिमट रहा है..
जब
मैं छोटा था,
शायद दोस्ती
बहुत गहरी
हुआ करती थी,
दिन भर
वो हुजूम बनाकर
खेलना,
वो
दोस्तों के
घर का खाना,
वो
लड़कियों की
बातें,
वो
साथ रोना…
अब भी
मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती
जाने कहाँ है,
जब भी
“traffic signal”
पर मिलते हैं
“Hi” हो जाती है,
और
अपने अपने
रास्ते चल देते हैं,
होली,
दीवाली,
जन्मदिन,
नए साल पर
बस SMS आ जाते हैं,
शायद
अब रिश्ते
बदल रहें हैं..
.ं
जब
मैं छोटा था,
तब खेल भी
अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई,
लंगडी टांग,
पोषम पा,
टिप्पी टीपी टाप.
अब
internet, office,
से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद
ज़िन्दगी
बदल रही है.
.
.
जिंदगी का
सबसे बड़ा सच
यही है..
जो अकसर क़ब्रिस्तान के बाहर
बोर्ड पर
लिखा होता है…
“मंजिल तो
यही थी,
बस
जिंदगी गुज़र गयी मेरी
यहाँ आते आते”
.
ज़िंदगी का लम्हा
बहुत छोटा सा है…
कल की
कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल
सिर्फ सपने में ही है..
अब
बच गए
इस पल में..
तमन्नाओं से भर
इस जिंदगी में
हम सिर्फ भाग रहे हैं.
कुछ रफ़्तार
धीमी करो,
मेरे दोस्त,
और
इस ज़िंदगी को जियो..
खूब जियो मेरे दोस्त….. ।।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

"माँ तुम बहुत याद आती हो"

एक  विवाहित बेटी का पत्र उसकी माँ के नाम

"माँ तुम बहुत याद आती हो"

अब मेरी सुबह 6 बजे होती है और रात 12 बज जाती है, तब

"माँ तुम बहुत याद आती हो"

सबको गरम गरम परोसती हूँ, और खुद ठंढा ही खा लेती हूँ, तब

"माँ तुम बहुत याद आती हो"

जब कोई बीमार पड़ता है तो
एक पैर पर उसकी सेवा में लग जाती हूँ,

और जब मैं बीमार पड़ती हूँ
तो खुद ही अपनी सेवा कर लेती हूँ, तब

"माँ तुम बहुत याद आती हो"

जब रात में सब सोते हैं,
बच्चों और पति को चादर ओढ़ाना नहीं भूलती,

और खुद को कोई चादर ओढाने वाला नहीं, तब

"माँ तुम बहुत याद आती हो"

सबकी जरुरत पूरी करते करते खुद को भूल जाती हूँ,
खुद से मिलने वाला कोई नहीं, तब

"माँ तुम बहुत याद आती हो"

यही कहानी हर लड़की की शायद शादी के बाद हो जाती है

कहने को तो हर आदमी शादी से पहले कहता है

"माँ की याद तुम्हें आने न दूँगा"

पर, फिर भी क्यों?

"माँ तुम बहुत याद आती हो"

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

खवाहिश नही मुझे मशहुर होने की

खवाहिश  नही  मुझे  मशहुर  होने  की।
आप  मुझे  पहचानते  हो  बस  इतना  ही  काफी  है।
अच्छे  ने  अच्छा  और  बुरे  ने  बुरा  जाना  मुझे।
क्यों  की  जीसकी  जीतनी  जरुरत  थी  उसने  उतना  ही  पहचाना  मुझे।
ज़िन्दगी  का  फ़लसफ़ा  भी   कितना  अजीब  है,
शामें  कटती  नहीं,  और  साल  गुज़रते  चले  जा  रहे  हैं....!!
एक  अजीब  सी  दौड़  है  ये  ज़िन्दगी,
जीत  जाओ  तो  कई  अपने  पीछे  छूट  जाते  हैं,
और  हार  जाओ  तो  अपने  ही  पीछे  छोड़  जाते  हैं।.

जब  बचपन  था,  तो  जवानी  एक  ड्रीम  था...

जब  बचपन  था,  तो  जवानी  एक  ड्रीम  था...
जब  जवान  हुए,  तो  बचपन  एक  ज़माना  था... !!

जब  घर  में  रहते  थे,  आज़ादी  अच्छी  लगती  थी...

आज  आज़ादी  है,  फिर  भी  घर  जाने  की   जल्दी  रहती  है... !!

कभी  होटल  में  जाना  पिज़्ज़ा,  बर्गर  खाना  पसंद  था...

आज  घर  पर  आना  और  माँ  के  हाथ  का  खाना  पसंद  है... !!!

स्कूल  में  जिनके  साथ  ज़गड़ते  थे,  आज  उनको  ही  इंटरनेट  पे  तलाशते  है... !!

ख़ुशी  किसमे  होतीं है,  ये  पता  अब  चला  है...
बचपन  क्या  था,  इसका  एहसास  अब  हुआ  है...

काश  बदल  सकते  हम  ज़िंदगी  के  कुछ  साल..

.काश  जी  सकते  हम,  ज़िंदगी  फिर  एक  बार...!!

जब हम अपने शर्ट में हाथ छुपाते थे
और लोगों से कहते फिरते थे देखो मैंने
अपने हाथ जादू से हाथ गायब कर दिए
|

✏जब हमारे पास चार रंगों से लिखने
वाली एक पेन हुआ करती थी और हम
सभी के बटन को एक साथ दबाने
की कोशिश किया करते थे |❤

जब हम दरवाज़े के पीछे छुपते थे
ताकि अगर कोई आये तो उसे डरा सके..

जब आँख बंद कर सोने का नाटक करते
थे ताकि कोई हमें गोद में उठा के बिस्तर तक पहुचा दे |

सोचा करते थे की ये चाँद
हमारी साइकिल के पीछे पीछे
क्यों चल रहा हैं |

On/Off वाले स्विच को बीच में
अटकाने की कोशिश किया करते थे |

फल के बीज को इस डर से नहीं खाते
थे की कहीं हमारे पेट में पेड़ न उग जाए |

बर्थडे सिर्फ इसलिए मनाते थे
ताकि ढेर सारे गिफ्ट मिले |

फ्रिज को धीरे से बंद करके ये जानने
की कोशिश करते थे की इसकी लाइट
कब बंद होती हैं |

  सच , बचपन में सोचते हम बड़े
क्यों नहीं हो रहे ?

और अब सोचते हम बड़े क्यों हो गए ?⚡⚡

ये दौलत भी ले लो..ये शोहरत भी ले लो

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी...

मगर मुझको लौटा दो बचपन
का सावन ....☔

वो कागज़
की कश्ती वो बारिश का पानी..
..............
एक बात बोलू इंकार मत करना आपको आप जिसे चाहते हे उनकी कसम हे।
10 लोगोको सेंड करो पर मुझे नहीं ।आज  आपको गुड न्यूज़ मिलेगी,अगर पढ़कर अन्जान
बने रहे तो शानिवार तक कुछ ऐसा होगा जो कभी सोचा भी नहीं ।

हम "हसना" नहीं छोडते...

खुद की तरक्की में इतना
      समय लगा दो
की किसी ओर की बुराई
   का वक्त ही ना मिले......
"क्यों घबराते हो दुख होने से,
जीवन का प्रारंभ ही हुआ है रोने से..
नफरतों के बाजार में जीने का अलग ही मजा है...
लोग "रूलाना" नहीं छोडते...
और हम "हसना" नहीं छोडते।

अब तो आप लोगों से ही आशा है।

लड़की पसंद की शादी करने के कुछ दिनो के बाद शर्मिंदा-शर्मिंदा वापिस अपने मायके आ गयी।
माँ ने वजह पूछी , तो बोली:

क्या बताऊँ माँ...
लड़का तो "अध्यापक" निकला..
एक नंबर का कंगाल।
न घर न द्वार, न पैसा न माल।
बस श्रीमान ठन-ठन गोपाल।
5 पैसे की सेविंग नहीं।
घर किराए का था,
बाइक लोन पर है ,
मोबाइल चाइना का है ,
परचून की दुकान में,
12'570/- की उधारी है।
पैसा वो देता नहीं...
दुकानदार मुझे घूरता है।
एक LIC की पालिसी है,
मात्र 500 रु. महीना..
उसका भी तीन महीने से
प्रीमियम नहीं पटा है।
और तो और...
उसको 8 साल भी नहीं हुआ है।
जिसको सरकार ही
अपना नहीं मानती।
वो भला मेरा कैसे होगा??
ना आने का पता...
ना जाने का।
कभी 10 से 5 बजे,
कभी 9 से 3 बजे,
तो कभी 7 से 11 बजे जाता है।
समझ नहीं आता...
नाश्ता बनाऊं कि खाना??
कभी बी.एल.ओ. बन जाता है,
तो कभी अभिहित अधिकारी
जबरदस्ती का ओवरटाइम।
छुट्टियों में भी काम,
टाइम बच गया तो ट्रेनिंग।
तनख्वाह के बारे में
जब भी पूछो...
एक ही जवाब देता है,
अलाटमेंट नहीं है।
अब पता नहीं ये क्या होता है।
ना प्रमोशन का पता,
ना प्यार-मोहब्बत का टाइम।
ऊपर से सरकारका वादा,
पैसा कम और टेंसन ज्यादा!!
आजकल पता नहीं कौन सा
नजरी नक्शा बना रहा है,
पिछले 15 दिन से तो
नज़र ही नही आ रहा है।
उसके साथ जीवन मेरा तमाशा है,
अब तो आप लोगों से ही आशा है।

मन के भीतर, उठते प्रश्नों से हारा हूँ

हे भारत के मुखिया मोदी , बेशक समर्थक तुम्हारा हूं
पर अपने मन के भीतर, उठते प्रश्नों से हारा हूं

मेरे सारे मित्र मुझे , मोदी का भक्त बताते हैं
पर मुझको परवाह नही है, बेशक हंसी उड़ाते हैं

मुझे 'संघ' ने यही सिखाया, व्यक्ति नही पर देश बड़ा
व्यक्ति आते व्यक्ति जाते , मैं विचार के साथ खड़ा

बचपन से ही मेरे मन में ,रहा गूंजता नारा है
जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है

इसीलिए तुमको कुछ कसमें ,याद दिलाना वाजिब है
मेरी आत्मा कहती है, ये प्रश्न उठाना वाजिब है

ये सौगंध तुम्हारी थी, तुम देश नही झुकने दोगे
इस माटी को वचन दिया था, देश नही मिटने दोगे

ये सौगंध उठा कर तुमने, वंदे मातरम बोला था
जिस को सुनकर दिल्ली का, सत्ता सिंहासन डोला था

आस जगी थी किरणों की, लगता था अंधकार खो जायेगा
काश्मीर की पीड़ा का , अब समाधान हो जायेगा

जाग उठे कश्मीरी पंडित, और विस्थापित जाग उठे
जो हिंसा के मारे थे , वे सब निर्वासित जाग उठे

नई दिल्ली से जम्मु तक, सब मोदी मोदी दिखता था
कितना था अनुकूल समय, जो कभी विरोधी दिखता था

फिर ऐसी क्या बात हुई, जो तुम विश्वास हिला बैठे
जो पाकिस्तान समर्थक हैं, तुम उनसे हाथ मिला बैठे

गद्दी पर आते ही उसने, रंग बदलना शुरू किया
पहली प्रेस वार्ता से ही, जहर उगलना शुरू किया

जिस चुनाव को खेल जान पर, सेना ने करवाया है
उस चुनाव का सेहरा उसने, पाक के सिर बंधवाया है

संविधान की उड़ा धज्जियां,अलगावी स्वर बोल दिए
जिनमें आतंकी बंद थे , वे सब दरवाजे खोल दिए

अब बोलो क्या रहा शेष,बोलो क्या मन में ठाना है
देर अगर हो गयी समझ लो,जीवन भर पछताना है

गर भारत की धरती पर,आतंकी छोड़े जायेगें
तो लखवी के मुद्दे पर, दुनिया को क्या समझायेंगे

घाटी को दरकार नही है, नेहरू वाले खेल की
यहां मुखर्जी की धारा हो ,नीति चले पटेल की

अब भी वक़्त बहुत बाकी है, अपनी भूल का सुधार करो
ये फुंसी नासूर बने ना, जल्दी से उपचार करो

जिस शिव की नगरी से जीते,उस शिव का तुम कुछ ध्यान करो
इस मंथन से विष निकला है, आगे बढ़ कर पान करो

गर मैं हूं भक्त तुम्हारा तो, अधिकार मुझे है लड़ने का
नही इरादा है कोई, अपमान तुम्हारा करने का

केवल याद दिलाना तुमको, वही पुराना नारा है
जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है।।

किसी की मजबूरियाँ पे न हँसिये

कुछ सुंदर पंक्तियाँ...

किसी की मजबूरियाँ पे न हँसिये,
कोई मजबूरियाँ ख़रीद कर नहीं लाता..!
डरिये वक़्त की मार से,
बुरा वक़्त किसीको बताकर नही आता..!
अकल कितनी भी तेज ह़ो,
नसीब के बिना नही जीत सकती..!
बिरबल अकलमंद होने के बावजूद,
कभी बादशाह नही बन सका..
ना तुम अपने आप को गले लगा सकते हो, ना ही तुम अपने कंधे पर सर रखकर रो सकते हो..एक दूसरे के लिये जीने का नाम ही जिंदगी है..! इसलिये वक़्त उन्हें दो जो तुम्हे चाहते हों दिल से.. रिश्ते पैसो के मोहताज़ नहीं होते क्योंकि कुछ रिश्ते मुनाफा नहीं देते पर  अमीर जरूर बना देते है.... !!!

दिल की देहरी से ..........

दिल की देहरी से ...........
अाज की गजल....

कभी कभार अपने दिल की भी सुन लिया कर
ख्वाब सुनहरे पलकोँ पर बुन लिया कर

क्या देखता है मेरी आखोँ मेँ इतनी हसरत से
आईने के लिए भी कुछ लम्हे चुन लिया कर

जीने का शऊर सीख जरा इन शाखों  से
बहती हवाओं के साथ थोडा झुक लिया  कर

कश्तीयों के भरोसे ही  मिलती नहीँ मंजिल फकत
उतरने से पहले इन हवाओं का रुख लिया कर

फूल बनकर ही तुमने मुझे ज़ख्मी हर बार किया
अपनी जात पे आ ,कभी काँटे सा चुभ लिया कर

आना और जाना ही दस्तूर नहीँ इस दुनिया का
वक्त नहीँ है तू ,कंही पे दम पर रुक लिया कर

रोशनी की कद्र भला तारीकियोँ ने कब जानी है
बस अंदर से जल बाहर से बुझ लिया कर

(Ratan Singh Champawat)

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

नहीं भूलती दो चीज़ें

फजूल ही पत्थर रगङ कर आदमी ने
चिंगारी की खोज की,
अब तो आदमी आदमी से जलता है..!
मैने बहुत से ईन्सान देखे हैं,
जिनके बदन पर लिबास नही होता।
और बहुत से लिबास देखे हैं,
जिनके अंदर ईन्सान नही होता ।
कोई हालात नहीं समझता ,
कोई जज़्बात नहीं समझता ,
ये तो बस अपनी अपनी समझ की बात है...,
कोई कोरा कागज़ भी पढ़ लेता है,
तो कोई पूरी किताब नहीं समझता!!
"चंद फासला जरूर रखि‍ए हर रि‍श्‍ते के दरमियान !
     क्योंकि"नहीं भूलती दो चीज़ें चाहे
जितना भुलाओ....!
         .....एक "घाव"और दूसरा "लगाव"

ज़िन्दगी एक सफ़र

"ज़िन्दगी एक सफ़र है, आराम से चलते रहो..
उतार-चढ़ाव तो आते रहेंगें, बस गियर बदलते रहो..
सफर का मजा लेना हो तो साथ में सामान कम रखिए और..
जिंदगी का मजा लेना हैं तो दिल में अरमान कम रखिए..

तज़ुर्बा है मेरा, मिट्टी की पकड़ मजबुत होती है..
संगमरमर पर तो हमने, पाँव फिसलते देखे हैं..