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मंगलवार, 10 मार्च 2015

रस्म-ए-वफ़ा

ए खुदा माना हर इन्सान कि ज़िन्दगी कि किताब आपने लिखी है।
पर कुछ पन्नो पर तो ये लिख देते...................।    

धोखा खाना तो मोहब्बत वालो की एक
रस्म-ए-वफ़ा है,
फूल अगर खुशी के लिए होता,, तो लोग
जनाज़े पर नही डालते.................।

किसी से भूल कर भी अपने दिल की बात मत
कहना,
यहाँ ख़त भी जरा-सी देर में अखबार होता है...............।                                 

नींद नहीं आती
अपने गुनाहों के डर से
अल्लाह"
फिर सुकून से सो
जाता हु ये सोच कर
तेरा एक नाम "रहीम"
भी है..................।

नींद से मेरा ताल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के
मेरी छत पे टहलते क्यों हैं.................।

लोग पूछते हैं..कौन है वो जो तेरी ये हालत कर गयी
मैं मुस्कुरा के कहता हूँ..उसका नाम हर किसी के लब पे अच्छा नहीं लगता..............।

इस जीवन की चादर में,सांसों के ताने बाने हैं।दुख की थोड़ी सी सलवट है,सुख के कुछ फूल सुहाने हैं।क्यों सोचे आगे क्या होगा,अब कल के कौन ठिकाने हैं।ऊपर बैठा वो बाजीगर ,जाने क्या मन में ठाने है।चाहे जितना भी जतन करे,भरने का दामन तारों से।झोली में वो ही आएँगे,जो तेरे नाम के दाने है।..................।

कोई नामुमकिन सी बात मुमकिन करके दिखा,खुद
पहचान लेगा ज़माना तुझे, तू भीड़ में भी अलग चल कर दिखा

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